तुलसीदास के दस दोहे (10 Tulsidas ke Dohe)

स्वागत है आपका हमारे इस वेब पेज़ पर जहां पर हम संत गोसवामी तुलसीदास के बारे मैं और उनके सुनाये गए कभी ना भूलने वाले दोहों पर एक नज़र डालेंगे और समझेंगे की उनके इन प्रवाचों का अर्थ क्या है। और इससे पहले की हम आगे बढ़ें, आइये पहले एक नज़र डाल लेते हैं की संत तुलसीदास जी कौन थे। 

तुलसीदास कौन थे? (Who was Tulsidas?)

गोसवामी तुलसीदास, जिन्हें स्वानी तुंसीदास, के नाम से भी जाना जाता है, वह हिन्दू समाज के एक बहुत प्रसिद्ध संत, लेखक और कवि थे।  उन्होने कई किताबें लिखीं जो सनातन धर्म और भारतीय विचारधारा की अभिव्यक्ति हैं। उनकी सबसे प्रसिद्ध पुस्तक राम चरितमानस (Ramcharit Maanas) है और उन्हें ही हनुमान चालीसा का लेखक भी मन जाता है।

यह भी मानना है की तुलसीदास जी संत वाल्मीकि जी के रूप थे और उनकी रामायण कथा सुनने के लिए स्वयं हनुमान जी उनके आश्रम में आया करते थे।  हनुमान जी के कहने पर ही तुलिसदास चित्रकूट चले गए जहाँ उन्हें भगवान राम के सक्षात दर्शन भी हुए थे।

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गोस्वामी तुलसीदास का जन्म (Goswami Tulsidas' Birth)

संत तुलसीदास का जन्म 1532 ई. में सुकरखेत सोरों में हुआ जो की आज के भारत वर्ष में उत्तर प्रदेश में है। उनके माता-पिता का नाम हुलसी और आत्माराम दुबे था। कहा जाता है की उनके जन्म लेने के तुरंत बाद रोने की जगह, उनके मुख से “राम” निकला और इसीलिए उनका बचपन में नाम रामबोला रखा गया था। पर बुरे नक्षत्रों में पैदा के कारन, उनके माता पिता ने उनका त्याग कर दिया और उनको अपनी एक दासी चुनरी के साथ उनसे गांव हरिपुर भेज दिया।

जब वह पांच साल के हुए तो चुनरी देवी गुजर गईं और नन्हे से रामबोला को अपना पालन पोषण भीख मांग कर करना पड़ा। 6 साल की उम्र में वह संत नरहरिदास की छाओं में आ गए और उन्होंने ही उनका नाम तुलसीदास रखा और उन्हें रामायण और अन्य वेदों की शिक्षा दी।Gos

गोस्वामी तुलसीदास का परिचय | Introduction to Goswami Tulsidas

गोस्वामी तुलसीदास (Goswami Tulsidas) भारत देश के हिन्दी के महान भक्ति कवि रहे हैं। आपने रामचरितमानस या रामायण के बारे में ज़रूर सुना होगा। हालाँकि रामायण का सबसे पहला वर्णन संत वाल्मीकि ने किया था, पर उसी रामायण की एक रचना, रामचरितमानस, तुलसीदास जी ने हाथों भी हुई। और यह रचना, भगवन राम के जीवन की सबसे प्रसिद्द रचना भी बानी।

संत तुलसीदास की 100 से भी अधिक लोकप्रिय रचनाएं हैं जिनका उपयोग लोग सिर्फ भक्ति काव्य से नहीं बल्कि आम जीवन जीने में उपयोगी बातें सीखने के लिए भी करते हैं। तुलसीदास के दोहों को भारतीय सभ्यता ने बहुत प्रेम पूर्वक अपनाया है और ज़ोर शोर से इनका प्रचार प्रसार भी किया है। 

इसलिए हम आप के लिए लाये हैं संत तुलसीदास के दोहे (Tulsidas Ke Dohe)। आज हम आपको तुलसीदास की दोहावली (Tulsi Dohawali) के मार्ग पर ले जा रहे हैं और दोहों के साथ साथ उनका साधारण भाषा में अर्थ भी बताने जा रहे है। यह तुलसी दोहावली, आपके जीवन में सकरात्मक ऊर्जा को प्रवाहित करेगी और साथ ही यह दोहे आपके जीवन को प्रेरणा से भरने में भी सहायक होंगे। तो आइये जानते है तुलसीदास के दोहे सार सहित विस्तार से।

तुलसीदास के दोहे | Tulsidas ke Dohe in Hindi

आशा करते हैं की हमारी यह कोशिश आपको पसंद आएगी।

1. मीठे बचन

तुलसी मीठे बचन ते, सुख उपजत चहुँ ओर ।

बसीकरन इक मंत्र है,परिहरू बचन कठोर ।।

संत तुलसीदास के इस दोहे का मतलब है: मीठे वचन से हम सब ओर सुख फैला सकते हैं। किसी को भी वश में करने के लिए मिठास भरे शब्द एक मन्त्र जैसे होते हैं इसलिए इंसान को चाहिए कि कठोर वचन छोडकर मीठा बोलने का प्रयास करे और अनजानों को भी अपना बना ले

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2. दया धर्म का मूल है

दया धर्म का मूल है पाप मूल अभिमान

तुलसी दया न छोडिये जब तक घट में प्राण 

संत तुलसीदास के इस दोहे का मतलब है: धर्म का असली मूल तो दूसरों पर दया रखना है और अभिमान ही पाप की नींव है। इसीलिए जब तक जीवन है इंसान को दया करनी नहीं छोड़नी चाहिए। “

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3. मुखिया मुखु सो चाहिऐ

मुखिया मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक |

पालइ पोषइ सकल अंग तुलसी सहित बिबेक ||

संत तुलसीदास के इस दोहे का मतलब है: मुखिया यानि की Leader बिलकुल इंसान के मुख की तरह होना चाहिए।  मुख खाना अकेला खाता है लेकिन शरीर के सभी अंगों का बराबर पोषण करता है। उसी तरह मुखिया को अपना काम इस तरह से करना चाहिए की उसका फल सब में बंटे।

4. आवत हिय हरषै नहीं

आवत हिय हरषै नहीं, नैनन नहीं सनेह।

तुलसी तहाँ न जाइए, कंचन बरसे मेह॥

संत तुलसीदास के इस दोहे का मतलब है: जहां जाने से वहां के लोग आप को देखते ही प्रसन्न न हों और जिनकी आँखों में प्रेम न हो, ऐसी जगह चाहे कितना ही लाभ और  सम्पन्नता क्यों न हो वहाँ कभी नहीं जाना चाहिए।

तुलसीदास के दोहे ( Sant Tulsidas Ke Dohe in Hindi)

5. तुलसी’ साथी विपति के

तुलसी साथी विपति के विद्या, विनय, विवेक।

साहस, सुकृत, सुसत्य, व्रत – राम भरोसो एक॥

संत तुलसीदास के इस दोहे का मतलब है: किसी विपत्ति के समय आपको ये सात गुण बचायेंगे: आपका ज्ञान, आपकी विनम्रता, आपकी बुद्धि, आपके भीतर का साहस, आपके अच्छे कर्म, सच बोलने की आदत और ईश्वर में विश्वास।

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6. हस मिल बोलिए

तुलसी इस संसार में, भांति भांति के लोग।

सबसे हस मिल बोलिए, नदी नाव संजोग॥

संत तुलसीदास के इस दोहे का मतलब है: इस दुनिया में अलग अलग तरह के लोग रहते हैं। हमें उनसे मेल मिलाप, प्यार और सहयोग के साथ यह छोटी सी ज़िन्दगी ख़ुशी ख़ुशी बितानी चाहिए।

7. तुलसी भरोसे राम के

तुलसी भरोसे राम के, निर्भय हो के सोये।

अनहोनी होनी नहीं, होनी हो सो होए॥

संत तुलसीदास के इस दोहे का मतलब है: तुम्हारे हाथ में जितना है उतना करो बाकी भगवान् पर विशवास करके चैन की बांसुरी बजाओ। इस संसार में कुछ भी अनहोनी नहीं होगी और जो होना है उसे कोई रोक नहीं सकता। इसलिये आप सभी आशंकाओं के तनाव से मुक्त होकर अपना काम करते रहें।

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तुलसीदास के दोहे ( Sant Tulsidas Ke Dohe in Hindi)

8. सचिव बैद गुरु तीनि जौं

सचिव बैद गुरु तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।

राज धर्म तन तीनि कर होई बेगिहीं नास।।

संत तुलसीदास के इस दोहे का मतलब है: यदि गुरू (teacher), वैद्य (doctor) और सलाहकार (wellwishers) से डर या फायदे की आशा से अच्छा बोलते है तो धर्म, शरीर और राज्य इन तीनों का विनाश शीघ्र ही तय है।

9. धरी कोकिलन मौन

लसी पावस के समय, धरी कोकिलन मौन।

अब तो दादुर बोलिहं, हमें पूछिह कौन।।

संत तुलसीदास के इस दोहे का मतलब है: जब बारिश का मौसम होता है तो मेढ़कों के टर्राने की आवाज इतनी तेज हो जाती है कि उसके सामने कोयल की भी आवाज कम लगने लगती है। इसी प्रकार जब मेढ़क जैसे मूर्ख लोग अधिक बोलने लग जाते हैं, तब समझदार लोग अपना मौन धारण कर लेते हैं। वो अपनी ऊर्जा को व्यर्थ नहीं करता। समय अपने आप सही गलत का एहसास करा देता है।

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10. करम प्रधान

कर्म प्रधान विस्व करि राखा।

जो जस करई,सो तस फलु चाखा।।

संत तुलसीदास के इस दोहे का मतलब है:  इश्वर ने कर्म को ही महानता दी है। उनका कहना है कि जो जैसा कर्म करता है उसको वैसा ही फल मिलता है।

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